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Rajasthan Election: राजस्थान में चुनाव आते ही ओबीसी वोटर को लुभाने के लिए क्यों मची रहती है सभी राजनीतिक दलों में होड़।

Rajasthan Election:विधानसभा चुनावों को आम तौर पर सरसरी निगाह से देखें तो पूरा प्रदेश जातियों में बंटा नज़र आता है.
ओबीसी में शामिल जातियां किसी एक मंच पर दिखाई नहीं देती हैं. लेकिन धरातल के सच को देखें तो ओबीसी का वर्चस्व बाकी सभी आरक्षित और अनारक्षित वर्गों पर भारी है.

Rajasthan Election:प्रदेश की राजनीति में यह लगातार गहराता गया रुझान है, लेकिन यह जातियों की उड़ती धूल में थोड़ा धुंधला जाता है.आंकड़े साफ़ बताते हैं कि राजस्थान की राजनीति में ओबीसी एकदम बुलेटप्रूफ़ हैं. उसे कोई हिला नहीं सकता.इस दृष्टि से प्रदेश की राजनीति का कभी ठीक से अध्ययन ही नहीं हुआ. इस लिहाज से ऐसा प्रतीत होता है कि ऊपर से विभाजित दिखने वाली ओबीसी ज़मीनी स्तर पर अपने अनुभवों से काम करते हुए एक अलग तरह का पॉलिटिकल पिरामिड खड़ा करती है.

Rajasthan Election: As soon as elections come in Rajasthan, why is there competition among all political parties to woo OBC voters?
Rajasthan Election: As soon as elections come in Rajasthan, why is there competition among all political parties to woo OBC voters?

2015 में ओबीसी के लिए सरपंच के 783 पद आरक्षित थे, लेकिन इस वर्ग के सरपंच 1017 लोग बने.ओबीसी महिलाओं में यह आंकड़ा हैरतअंगेज़ रहा. सामान्य महिलाओं में 2412 सीटों पर महज 966 महिलाएं चुनी जा सकीं. लेकिन ओबीसी महिलाओं ने अपने लिए रखे गए 646 पदों को पार करके 2001 सीटों पर परचम लहराया.

राजस्थान राज्य चुनाव आयोग में आंकड़ों पर काम कर चुके कई अधिकारी बताते हैं कि पंचायत चुनाव के बाद जब कभी नतीजे आते हैं और उनका विश्लेषण होता है तो अनारक्षित वर्ग के लोगों के चेहरे मुरझाने लगते हैं और उन्हें लगने लगता है कि ओबीसी वाले उनके हिस्से में भारी सेंधमारी कर चुके हैं.महिलाओं में भी शिक्षा और जागरूकता का बहुत प्रसार हुआ है. इस वजह से वे गांव, देहात, खेत और खलिहान से बाहर आकर सियासत में दबदबा कायम कर चुके हैं.

राजस्थान में चुनाव आते ही ओबीसी और सवर्ण जातियों के सम्मेलनों की झड़ी लग जाती है. हर जाति अपने लिए अधिक से अधिक टिकट मांगती है. इसे देखकर अब सरकार भी उन जातियों को लुभाने के लिए बोर्ड बनाने लगी है. प्रदेश में इस बार इस तरह के 40 से अधिक जातियों के बोर्ड बन चुके हैं. अब यह इससे वंचित रह जाने वाली जातियों में एक नई प्रतिद्वंद्विता को जन्म दे रहा है और नित नए सम्मेलन हो रहे हैं.”

 

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